TANSEN, TOMB, GWALIOR

मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा ग्वालियर

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ग्वालियर में स्तिथ तानसेन का मकबरा ही वो जगह है जहाँ अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक मियाँ तानसेन 400 साल से आराम कर रहे है, यानि के यंहा दफ़न है. अकबरनामा के मुताबिक सन 1562 से 1586 तक तानसेन उनके दरबार में संगीतकार थे और ये समय मुग़ल इतिहास का सबसे स्वर्णिम समय था. संगीत सम्राट रहे तानसेन की नगरी ग्वालियर के बारे में कहा जाता है की यंहा बच्चे रोते है तो सुर में, पत्थर लुढ़कते है तो ताल में.

ग्वालियर शहर इन्ही एतिहासिक धरोहर के कारण लोगो में प्रचलित है यंहा भारतीय और इस्लामिक शैली में बनी कई प्राचीन इमारते है. मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा दोनों एक ही जगह पर है, इसका कारण है मरते समय उनकी आखरी इच्छा थी की उनको वहीँ दफनाया जाए जहां उनके गुरु दफ़न है.

तानसेन का मकबरा, ग्वालियर, मोहम्मद गौस
मोहम्मद गौस का मकबरा
तानसेन का मकबरा, ग्वालियर, मोहम्मद गौस
तानसेन का मकबरा

कौन थे तानसेन और मोहम्मद गौस

ये बात हम सब जानते है की तानसेन अकबर के नवरत्नों में शामिल थे यानि के मुग़ल दरबार के वो सदस्य जिन्हें मुग़ल सल्तनत में सबसे गुणकार और योग्य माना जाता था, तानसेन उस दरबार के संगीतकार थे. अकबर से पहले वो मान सिंह तोमर के दरबार में संगीतकार थे, मान सिंह की मौत के बाद यंहा से पलायन करके वो रेवा के राजा रामचन्द्र के दरबार में संगीतकार रहे और वहां उनको अकबर की तरफ से दिल्ली आने का निमंत्रन मिला. 1562 में जब वो दिल्ली आये तब तक वो ब्राह्मण ही थे और उनकी उम्र 60 साल थी.

तानसेन, मकबरा, ग्वालियर

इस बात का कोई तथ्य नहीं है की तानसेन की असल जन्म तिथि क्या थी लेकिन इतिहासकारों की माने तो उनका जन्म 1493 में ग्वालियर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था उनका नाम रखा गया था रामतनु पाण्डे. उनके पिता का नाम मकरंद पाण्डे था और वो बनारस के मंदिर में पुजारी थे . ‘ तानसेन ‘ को 6 साल की उम्र में ही ग्वालियर के मशहूर कवी और संगीतकार हरिदास के पास शिक्षा लेने भेज दिया गया था और समय के साथ साथ उनके संगीत की ख्याति दूर दूर तक फ़ैल गई.

मोहम्मद गौस एक सूफी संत थे वो संगीतकार भी थे , गुजरात में उन्होंने यात्रा की और वहां दस साल बिताये. तानसेन ने उनसे मुलाक़ात के बाद सूफी संगीत का गायन शुरू कर दिया था कई साल उनके साथ संगीत सिखने के बाद उन्होंने बृज भाषा में गायन शुरू किया. अकबर के दरबार में भी वो कृष्णा और शिव के भजन गाते थे . तानसेन के दो राग मशहूर थे दीपक राग और मल्हार राग, कहते है जब वो दीपक राग गाते थे तो दीपकों की लौ धधक उठती थी और मल्हार राग गाते ही बरसात शुरू हो जाती थी , इन सब गुणों को देखकर अकबर ने उन्हें मियां की उपाधि दी.

मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा

तानसेन की मर्त्यु 1586 में आगरा में हुई थी उनकी इच्छानुसार उनको उनके गुरु गौस साहब की कब्र के पास दफनाया गया इतिहास में इस बात के दो प्रमाण मिलते है कुछ के अनुसार उनको मुस्लिम रिवाजो से दफनाया गया कुछ कहते है हिन्दू रिवाजों के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ. उनकी अंतिम यात्रा में अकबर के साथ साथ देश के कई अन्य बड़े राजा महाराजा भी शामिल थे.

GRILL, GWALIOR, जाली का काम
मोहम्मद गौस के मकबरे के अंदर खुबसूरत जाली का काम

मोहम्मद गौस का मकबरा अकबर ने बनवाया था जो की उस समय आसपास के अन्य मकबरों की तुलना में बड़ा और आलिशान था. मकबरे में फतेहपुर सिकरी की तरह बेहद खुबसूरत जाली का काम किया गया है जो की मकबरे में रौशनी और हवा के आने के लिए बनाई गई थी. मकबरे में बीच में विशाल गुम्बद के निचे उनकी कब्र है जहाँ लोग धागा बाँध कर मन्नत मांग कर जाते है.

मोहम्मद गौस के मकबरे की खूबसूरती समय के साथ बाहर की तरफ से थोड़ी फीकी पड़ गई है शायद पर्यटन विबाग इस चीज पर ध्यान नहीं दे रहा. मकबरे के पास में मस्जिद है जहां नमाज पढने लोग आते रहते है इसके चलते इन मकबरों को देखने के लिए कोई टिकेट नहीं लगती. मोहम्मद गौस की कब्र के अलावा उनके कई अन्य शिष्यों और तानसेन के पुत्र की कब्र भी उनके मकबरे के पास में ही है.

तानसेन की कब्र
तानसेन की कब्र

मोहम्मद गौस के मुकाबले तानसेन का मकबरा काफी साधारण और छोटा है , एसा मैंने कहीं पढ़ा है की उनका जीवन एक दम साधारण था और जब म्रत्यु हुई तो अकबर ने उनके साधारण जीवन जीने के ढंग के अनुसार ये मकबरा बनवाया था. गाइड होता तो शायद अच्छे से जान पाता की तानसेन का मकबरा इतना साधारण और छोटा क्यूँ है . तानसेन की कब्र के पास एक इमली का पेड़ है की कुछ साल पहले लगाया गया है असल पेड़ शायद सूख गया था. जब तानसेन कोई राग गाते थे तो गला साफ करने के लिए वो इमली के पत्तो का सेवन करते थे वही इमली का पेड़ आगरा से लाकर यंहा लगाया गया था.

राव, अंकित, yayavar

कैसे पहुंचे तानसेन के मकबरे तक

इस मकबरे के चारो तरफ बाजार भीडभाड भरा है इसलिए कोशिश करे ऑटो रिक्शा से सफ़र करे मेरी तरह खुद के वाहन से जायेंगे तो पार्किंग की दिक्कत हो सकती है. ग्वालियर में कैब सेवा भी है जो की यंहा की भीड़ के हिसाब से अच्छा विकल्प है. ग्वालियर किले से मकबरे की दुरी 4 km है .

अन्य जानकारी

मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा देखने के लिए को शुल्क नहीं लगता ना ही कोई पार्किंग फीस, और यंहा गर्मियों में जाते है तो कोशिश करे सुबह जल्दी या सूर्यास्त के समय जाने की .

टिकेट- निशुल्क

समय – सूर्योदय से सूर्यास्त तक

और अधिक जानकारी के लिए यंहा पढ़े

मेरा पिछला ब्लॉग – सास बहू मंदिर ग्वालियर

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

3 thoughts on “मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा ग्वालियर

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