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ईसा खान का मकबरा: दिल्ली की एक पुनर्विक्सित धरोहर

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अगर आप कभी दिल्ली में घूमे है तो आपने महसूस किया होगा दिल्ली का इतिहास कितना लम्बा चौड़ा है, जिसने न जाने कितने ही उतार चढ़ाव देखे है| आपको नहीं मालुम हो तो बता दू दिल्ली शहर कुल 7 बार वीरान हुआ और 8 बार बसाया गया है, अभी जिस दिल्ली को हम मेट्रो से कुछ ही देर में पार कर लेते है वो आठवी बार बसाई गयी दिल्ली है| दिल्ली ने कई रियासतों का पतन होते देखा है पहले अफगान फिर तुर्क उसके बाद मुग़ल और अंत जुल्मी फिरंगी, इन्ही रियासतों के बीच एक सुर वंश भी था जिसने दिल्ली पर राज किया| उसी सुर वंश के बादशाह शेरशाह सूरी के एक दरबारी और सुर वंश के आमिर रहे ईसा खान के मकबरे की आज मै आपको इस यात्रा चिट्ठे के माध्यम से सैर करवाऊंगा|

ईसा खान नियाजी का मकबरा हुमायु के मकबरे से कुछ दुरी पर बना है और अभी कुछ साल पहले ही इस मकबरे को पर्यटन विभाग ने दुरुस्त किया है | उस से पहले ये मकबरा एक सदी से रेत में दबा हुआ था कुल 325 हजार क्यूबिक फीट जमीन को खोदकर मकबरे को वापस उसी हाल में लाया गया जैसा वो सोलहवी सदी में था , और बताते है की लोधी अष्टकोणीय वास्तुकला का उदाहरण ये ईसा खान का मकबरा ही केवल एक दुरुस्त इमारत है |

isa khan ka makbra
ईसा खान का मकबरा
inside isa khan tomb
मकबरे के अंदर

कौन था ईसा खान नियाजी

ईसा खान नियाजी का जनम 1453 में दिल्ली में हुआ था, मूल रूप से वो पास्तुनी थे मगर सुर वंश के राज दरबार में ईसा खान एक ऊँचे पद पर बैठते थे| शेरशाह सूरी के लिए काम करते हुए ईसा खान ने मुगलों से कई युद्ध लड़े और उनकी इसी वीरता को देखके शेरशाह ने उन्हें इस ख़ास पद पर बैठाया था , शेरशाह के बाद ईसा खान ने उनके बेटे इस्लाम शाह सूरी के दरबार में भी आमिर के पद पे रहते हुए सुर साम्रज्य का कई लड़ाइयो में साथ दिया | 1548 में ईसा खान की म्रत्यु हुई और जिस समय उनकी म्रत्यु हुई उस समय सुर वंश आपसी विद्रोह के चलते कमजोर हो गया था और कुछ महीनो बाद मुगलों ने इस वंश को ख़तम कर दिया था |

ईसा खान के मकबरे की मेरी यात्रा

दिसम्बर महीने की कडकडाती ठण्ड में मै एक सुबह दिल्ली भ्रमण पर निकला और यात्रा के लिए जो योजना बनाई उनमे हुमायूँ का मकबरा भी शामिल था, और मै जानता था के अगर दिल्ली के इतिहास को करीब से महसूस करना है तो सबसे पहले हुमायूँ का मकबरा जाना होगा | इस बदकिस्मत बादशाह के मकबरे की वास्तुकला और सुन्दरता अन्य मुग़ल मकबरों से बेहतरीन है , जब मुख्य दरवाजे से मकबरे में प्रवेश किया तो बाएं हाथ की और ईसा खान का मकबरा दिखाई दिया | ईसा खान के मकबरे के अंदर कभी एक पूरा गाँव बसता था बीसवी सदी के शुरुवात तक मकबरे के आहते में मुग़ल वंश के कुछ परिवार रहते थे लेकिन एक अंग्रेज अधिकारी लार्ड कर्जन ने बीसवी सदी में जब एतिहासिक इमारतो का जिर्नोदार करवाया तब उसने मकबरे में मौजूद अतरिक्त सरंचनाएं मिटा दी थी | बीसवी सदी तक मकबरे के आसपास का ज्यादातर हिस्सा मिटटी में दब चूका था , साल 2011 में पर्यटन विभाग के प्रयास के बाद खुदाई करके मकबरे को दोबारा उसके मूल रूप में लाया गया |

village inside isa khan tomb
कालान्तर में बसे गाँव की कुछ सरंचनाए

ईसा खान के मकबरे में एक मस्जिद भी है जो मकबरे के पूर्व में है , ये मस्जिद और आसपास बने घरो को देख सपष्ट होता है की कालान्तर में यहाँ एक पूरा गाँव बसता था| थोडा बहुत जर्जर हो चूका मकबरा और मस्जिद दोनों लोधी अष्टभुज वास्तुकला में बने है, मकबरे के अंदर ईसा खान और उनके भाइयो के कब्रे है, मकबरे के चारो तरफ बगीचे है जो की मुस्लिम धर्म में शायद जन्नत की पहचान माने जाते है |

grave inside tomb
मकबरे के अंदर मौजूद कब्रे
isa khan mosque
मस्जिद के अंदर

कैसे पहुंचे ईसा खान के मकबरे तक

दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में ईसा खान का मकबरा हुमायूं मकबरा परिसर के अंदर बना है  , हुमायूँ मकबरे के प्रवेश द्वार से कुछ कदम चलने के बाद बायीं तरफ एक छोटे से द्वार को पार करके मकबरे तक पहुंचा जाता है | मकबरे को देखने के लिए अलग से कोई टिकेट नहीं है , हुमायूँ के मकबरे के लिए लगने वाली टिकट द्वारा ही ईसा खान के मकबरे में जा सकते है |

समय- सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक

मकबरे के बारे में और अधिक जानकारी के लिए वर्ल्ड मोनुमेंट फण्ड की वेबसाइट पर पढ़े |

पिछला लेख – जामा मस्जिद दिल्ली 

 

 

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

3 thoughts on “ईसा खान का मकबरा: दिल्ली की एक पुनर्विक्सित धरोहर

    Usha

    (December 23, 2018 - 9:50 am)

    You explained it beautifully!!!!!

      rao ankit

      (December 24, 2018 - 10:16 pm)

      Thanks usha

    Cheapessay

    (December 24, 2018 - 6:27 pm)

    Thanks a lot for the article post.Much thanks again. Fantastic.

Comments are closed.