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रानी पदमिनी का इतिहास | Real story of Rani padmini

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रानी पदमिनी का महल

जी हाँ ये Rani padmini का महल है | इतिहास के बालू रेत पर किसी के पद चिह्न उभरते हुए दिखाई दे रहे है समय की भीनी खेह के पीछे दूर से कही आत्म बलिदान की परंपरा का कारवां आता दिखाई दे रहा है | उस कारवां के आगे चंडी नाच रही है तलवारों की खनखनाहट और वीरो की हुंकारे ताल दे रही है खून से भरा हुआ खप्पर छल छला रहा है उसके पारदर्शी कंठ से रक्त स्पष्ट दिखाई दे रहा है | इतने विक्राल रूप धारण कर भी वह कितनी सुन्दर है कैसी अद्वितीय रण चंडी है सत्य आपकी तरफ बढ़ा आ रहा है | कितना मंगलमय है , कितना सुन्दर है , कितना भव्य है जी हां ये है रानी पदमावती का महल है | चारो तरफ से जल से गिरे हुए पत्थरों ने रो रो कर गाथाओ को घेर लिया है दुःख दर्द और वेदना पिंगल पिंगल कर पानी हो गई थी सब सूख सूख कर फिर पत्थर हो रही है | जल के बिच घिरा ये महल ऐसा लग रहा है जैसे जल समाधि के लिए तत्पर हो |

Rani padmini का इतिहास

बारहवी सदी में एक अफगान शाशक था अल्लाउदीन खिलजी जिसे अपनी सेना पर अत्यधिक घमंड था एक बार उसे पता चला की मेवाड़ की महारानी इतनी सुन्दर है की कंठ से पानी पीते हुए पानी भी दिखता है तो वो उसे पाने अपनी विशाल सेना लेकर निकल पड़ा मेवाड़ फतह करने | मेवाड़ में उस समय रतन सिंह रावल का राज था और उनकी महारानी थी पदमिनी जो सिंघल दीप यानी श्रीलंका की बेहद खुबसूरत राजकुमारी थी | रतन सिंह की सेना पूर्ण विकसित न होने के कारण मेवाड़ एक कमजोर रियासत थी मगर झुकना उन्हें तब भी मंजूर नहीं था | युद्ध होता तो विनाश संभव था मेवाड़ का रजा ने अल्लाउदीन से बात करना चाहा तो अल्लाउदीन ने रानी पदमिनी की मांग की इतना होते ही महल में तलवारे निकल गई | अब अल्लाउदीन भी उसे पाने के लिए कुछ भी करने को तयार था तो उसने रतन सिंह के साथ शर्त राखी के वो बस उसे देख कर वापस चला जाएगा लेकिन राजपूतो में एक परम्परा थी के कोई बाहरी पुरुष रानी को बेपर्दा नहीं देख सकता | रतन सिंह ने इनकार किया तो युद्ध की संभावनाए देख कर दरबारियों ने सलाह दी रानी को देखने की रतन सिंह ने अल्लाउदीन को कहा के वो उसे दूर से देख सकता है परन्तु उसके बाद न युद्ध होगा न वो मेवाड़ आएगा

क्रूर अल्लाउदीन ने एक झूठा वचन दे कर ये बात स्वीकार कर ली | रानी के महल के सामने एक दीवार बनाई गई उस पर एक कमरा जहा खड़े हो कर अल्लाउदीन पानी में रानी का केवल प्रतिबिम्भ देख सके | वो भी कक्ष में लगे दर्पण में उसके पीछे गोरा और बदल नंगी तलवारे लेके खड़े हुए के जैसे ही अल्लाउदीन ने पीछे मुड़ने की कोशिश की उसे वही मार देंगे | अब अल्लाउदीन ने दर्पण में प्रतिबिम्भ देखा और पदमिनी की सुन्दरता का दीवाना हो गया और जाते जाते फैसला किआ के अब उसे पाना ही है | रतन सिंह को धोखे से अपहरण कर दिल्ली ले जाया गया और उसका क़त्ल कर दिया गया | अब बिन राजा के मेवाड़ और भी कमजोर हो गया और अफगानों ने शुरू कर दी मेवाड़ की चढ़ाई | राजपूतो ने हार सामने देख झुकने की बजाय फैसला किआ के वो सर पर भगवा कपडा बाँध साका करेंगे और देखते ही देखते राजपूत वीर युद्ध मैदान में कूद पड़े और वीरगति को प्राप्त हो गये | अब पदमिनी ने फैसला लिया के दुश्मन के भोग विलास का साधन बन ने से अच्छा वे जौहर करेंगी | जौहर में औरत आग से धधकते कुंड में कूद कर जान दे देती है सुनकर महल की सोलह हजार वीरांगनाए जौहर करने चल पड़ी | एक एक कर वो सब उस कुंड में हँसते हुए समा गई और अल्लाउदीन रणभूमि से देख अफ़सोस कर रह गया |

Rani padmini और जौहर

रानी पदमिनी जिसके सौन्दर्य के आगे देव लोक की साध्विकता बेहोश हो जाया करती थी जिसकी खुशबू चुरा कर फूल आज भी संसार में खुशहाली की सोरंग बरसाते है | उसे भी कर्तव्य पालन की कितनी कीमत चुकानी पड़ी सब राख कर ढेर हो गई केवल खुशबू बिखर रही है पारखियो की टोह में क्षत्रिय होने का इतना दंड शायद ही किसी ने चुकाया हो | भोग ,विलास,सौन्दर्य के परिधानों को पहन कर मंगल कलशो से शुशोभित कर रानी पदमिनी के महलो में आये तब सती ने उन्हें लात मारकर जौहर का अनुष्ठान किया था |

अपने छोटे भाई बादल को रण के लिए विदा देते हुए रानी ने पूछा था मेरे छोटे सेनापति क्या तुम जा रहे हो तब सौन्दर्य के वो गर्वीले परिधान चीथड़े बनकर अपनी ही लज्जा छिपाने लगे थे मंगल कलशो के वो आम्र पल्लव सूख कर अपने विचारो की आंधी में उड़ गए भोग और विलास लात खा कर धुल चाटने लगे|एक और उनकी दर्द भरी कराह थी दूसरी और धूं धूं करती हुयी जौहर कुंड की लपटों से सोलह हजार वीरांगनाओ के शारीर की संविधाए जल रही थी | कर्तव्यो की नित्यता धूम्र बनकर वातावरण को पवित्र और पुलकित कर रही थी और संसार की अनित्यता जल जल कर राख का ढेर हो रही थी | लग रहा था जैसे काल भैरव की विराट रचना की जा रही थी वेदनाए भी अपना स्वाभाव रोना भूलकर रानी पदमिनी के साथ सती हो गई थी | दुर्ग का घेरा डाले शत्रु सेना प्रश्न करती है ‘ ये धुवा कैसा उठ रहा है ? ‘ तो दुर्ग ने जवाब दिया मूर्खो बल के घमंड से जिस वैभव को पाने की तुम्हारी कामना है यह वही धूम्रमय यह संसार है आज जिस बल के दम पर हुंकार भरते हो यह संसार उसी बल पर व्यंग्य कर रहा है |

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Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

2 thoughts on “रानी पदमिनी का इतिहास | Real story of Rani padmini

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