taragarh fort bundi

एक लुप्त होती धरोहर | TARAGARH FORT BUNDI

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बूंदी राजपूताने के दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र हाडोती में अरावली की पहाडियों में बसा छोटा सा नगर , जिसे प्राचीन समय में वृन्दावती के नाम से भी जाना जाता था . कोटा से लघभग तीस किलोमीटर दूर हाडा राजपूतो की बसाई हुई नगरी बूंदी के पहाड़ो की चोटिया दूर से ही मीणाओ के विस्थापित होने और हाडा चौहानों के स्थापित होने की कहानियो को बयाँ करती है . एक एतिहासिक किला taragarh fort Bundi जिसमे राजस्थान के कुछ अन्य किलो की तरह मुग़ल स्थापत्य कला का कोई ख़ास प्रभाव नहीं दिखता

बूंदी रियासत और taragarh fort bundi का इतिहास

taragarh fort bundi
तारागढ़ दुर्ग मुख्य प्रांगन का द्रश्य

शाकम्बरी चौहानों के इष्ट देव हाडा ने मेवाड़ रियासत का सावंत बन अपने वंश के राजनैतिक जीवन का शिलान्यास बाहरवी शताब्दी में किया , और तेहरवी शताब्दी में देव सिंह हाडा की पुत्री का विवाह मेवाड़ के कुंवर अरी सिंह के साथ हो गया, मांडलगढ़ और रतनगढ़ को खो चुके देव सिंह हाडा ने मेवाड़ का साथ पाकर भैन्सरोड़ गढ़ के पठारी क्षेत्रो पर अपना अधिकार जमा लिया . तेहरवी सदी में बंदू घाटी के कुशाहारा मीणाओ के सरदार जैय्ता के आतंक से पूरा इलाका भयग्र्शत था मीणाओ का अधिपत्य उन बीहड़ो में समाप्त करना एक बेहद मुश्किल काम था. देव सिंह हाडा ने मेवाड़ के साथ मिलकर 1340 में एक राजनैतिक चाल चली और मीणा सरदार जैयता को जहर देकर मार दिया गया और देव सिंह हाडा ने बूंदी पर अपना अधिकार जमा लिया .

बाद में देव सिंह हाडा के पौत्र नापा हाडा ने अपने इलाके का विस्तार किया और 1342 ईस्वी में अरावली पर्वत के शिखर पर एक चतुर्भुजाकार दुर्ग बनवाया जिसे की तारागढ दुर्ग ( taragarh fort bundi ) कहा जाता है , तारागढ़ मतलब तारो का महल पहाड़ी के निचे से देखने पर ये किला ठीक किसी तारे के समान दिखता है इसलिए इसका नाम तारागढ़ पड़ा .

taragarh fort bundi का प्रवेश द्वार
बूंदी किले का पर्मुख प्रवेश द्वार

कहा जाता है की आनंद से भरा एक समारोह taragarh fort bundi में रक्त रंजित हो उठा था , बूंदी के राव बीर सिंह हाडा की पुत्री का विवाह महाराणा खेता से होने वाला था उसी दौरान मेवाड़ के कुल पंडित ने राव बीर सिंह हाडा का अपमान कर दिया , उनके हाथ से दिए हुए दान को ये कहकर लौटा दिया के वो सिर्फ राजपूतो से दान स्वीकार करते है . हाडा कुल का अपमान राव लाल सिंह नहीं सहन कर पाए और क्रोधित होके ब्राह्मण पर अपनी तलवार निकाल ली , महाराणा खेता द्वारा उनके कुल पंडित पर लाल सिंह हाडा का ये क्रोध देखा नहीं गया और बिना विवाह के वो मेवाड़ वापस लौट गए .

तारागढ किले के इस समारोह से वधु की डोली की जगह दो अर्थिया उठी .,मेवाड़ के साथ बने मधुर संबंध विषाक्त हो गये , मेवाड़ के साथ संबंध बिगड़ते ही गुजरात और मालवा के लुटेरे इस बूंदी रियासत को लूटने लग गये .

बीर सिंह मारे जा चुके थे और उनके पुत्र बंदी बना कर मांडू में कैद कर लिए गए थे , इस दुःख की घडी में समर बंदू को बूंदी की गद्दी पर बैठाया गया , बंदू ने एक बार अपनी कुल देवी की पूजा को रोक कर उनका अपमान कर दिया जिसके क्रोध में उनके भतीजे नारायण सिंह ने उन पर तलवार से हमला कर दिया और बंदू मारा गया . बंदू को मार कर नारायण सिंह तारागढ़ बूंदी की गद्दी पर बैठ गये और मेवाड़ से फिर से संबंध सुधारने के लिए अपनी भतीजी कर्णावती का विवाह राणा सांगा से करवा दिया ( कर्णावती मेवाड़ की वही रानी है जिन्होंने दस हजार औरतो के साठ चित्तोड़ का दूसरा जौहर किया था ).

मुगलों से संधि और Taragarh fort bundi में कला का आगमन

bundi royal palace, तारगढ़ का किला बूंदी
दीवान ऐ आम और उसमे बूंदी का राज सिहांसन

मेवाड़ के साथ एक बार फिर से संबंध सुधरने के बाद बूंदी ने वापस मालवा से अपने इलाके छीन लिए . 1579 ईस्वी में एक राजा राव सुरजन हाडा , जिसने की रणथम्भोर और बूंदी के किले मुग़ल सम्राट अकबर को सौप दिए और उनसे संधि कर ली . इस संधि के खिलाफ आवाज उठाकर उनके दरबारी और बड़े पुत्र मेवाड़ के साथ शामिल हो गए . मुगलों द्वारा दिए गए खिताब और ओहदों के नशे में डूबे राव सुरजन हाडा के बाद भोज सिंह को गद्दी पर बैठाया गया .

bundi kila, तारागढ़

मुगलों के साथ मिलने से बूंदी रियासत के हाडाओ की गौरव गाथा और ताकत दोगुनी हो गई , कला और शिक्षा बूंदी में बढने लगी , एक से एक लाजवाब कलाकारी से भवनों का निर्माण होने लगा और बूंदी को छोटी काशी का नया नाम मिल गया .
1607 ईस्वी में taragarh fort bundi को असली रूप दिया जाने लगा दीवारों में चित्रकलाए उकेरी गई शानदार भवनों ने तारागढ़ के निचले हिस्से में जगह बनानी शुरू कर दी . शाशन हेतु बनाये गये इस दुर्ग पर कई चरणों में कई राजाओ द्वारा भवन बनाए गये . बूंदी के इतिहास उसके बलिदान कई राजनितिक नीतियों को और फैसलों को चित्रशाला की दीवारों पर दर्शाया गया.

तारागढ़ की चित्रशाला बूंदी के इतिहास का एक जीवित निर्देशात्मक विवरण है , जिस किले में नरसंहार हुए कई राजनितिक चाले चली गई वो किला राजपूती कला का एक अनूठा उदाहरण बनकर उभरा .

विलुप्त होती धरोहर

दरअसल तारागढ़ का किला निजी स्वामित्व के चलते समय के साथ साथ खंडहर बनता जा रहा है , उसमे जिन्दा है तो केवल दीवारों पर बनी क्लाकर्तिया . किले में प्रवेश हेतु तंग रास्ते , जंगली बंदरो का आतंक, चमगादड़ के मल अवशेष और किले में किसी संघ्राहल्या का न होना कुछ वजह है जो इस किले को लुप्त होता दिखाते है . मेरी राय है की आप अगर किले में जाए तो गाइड जरुर लेकर जाए अन्यथा हाडा राजाओ के इतिहास को आप जान नहीं पायेंगे

taragarh fort bundi में देखने लायक जगह

बादल महल , चित्रशाला , गर्भ गुंजन , छत्र महल , हाथी पोल , नवल सागर , गढ़ पैलेस , दीवान ऐ आम इत्यादि .

प्रवेश शुल्क tickets in taragrh fort bundi

tickets in taragrh fort bundi, places to see in bundi

भारतीय पर्यटक – 80 रुपए केवल गढ़ पैलेस और 100 रुपए अलग से दुर्ग हेतु

विदेशी पर्यटक – 500 रुपए

कैमरा – 100 रुपए

गाइड – 25 रुपए

पार्किंग – 50 रुपए

घुमने का उपयुक्त समय और राय

Taragarh fort bundi में घुमने का सही समय अक्टूबर से लेकर अप्रैल मध्य तक है . मेरी राय है की आप किले में किसी गाइड के साथ ही जाये जो आपको इतिहास बता सके अन्यथा किले में नाम मात्र एक दो शिलालेख ही है जो कुछ विवरण देता है . किला बंदरो का आरामगाह भी है अत: थोडा संभल कर चढाई करे .

बूंदी किला खुलने का समय

गर्मी में – सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक

सर्दी में – सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक

कैसे पहुचे कहा रुके

रेल द्वारा – बूंदी का नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन कोटा 36 किलोमीटर दूर है जो जयपुर चित्तोड़ मुंबई और बनारस से जुदा हुआ है .

हवाई मार्ग – बूंदी का नजदीकी एअरपोर्ट जयपुर है जो की लघभग 200 किलोमीटर दूर है और जयपुर से कोटा के लिए भी कुछ एक या दो उड़ान प्रतिदिन है . कोटा एअरपोर्ट पर केवल जयपुर से ही उड़ाने जारी है अत जयपुर तक हवाई यात्यरा करके आ सकते है

सड़क द्वारा – बूंदी कोटा जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के नजदीक है अत सरकारी और निजी बस यंहा हर समय उपलब्ध है.

होटल्स – बूंदी में हर तरह के होटल है जिसमे 400 रुपए से लेकर आपकी मर्जी अनुसार कमरे उपलब्ध है बूंदी हवेली , नवल सागर पैलेस , रानी पैलेस कई प्रशिद्ध होटल है होटल यंहा बुक करे

बूंदी के बारे में और जानकारी लेने के लिए यंहा पर क्लिक करे

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

3 thoughts on “एक लुप्त होती धरोहर | TARAGARH FORT BUNDI

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