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करणी माता मंदिर | A Tale behind Rat Temple

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करणी माता मंदिर, राजस्थान के बीकानेर जिले में स्थित है और इस मंदिर को  चूहों का मंदिर भी कहा जाता है | ये मंदिर सदियों पुरानी पौराणिक कथाओं की किसी देवी को नहीं बल्कि 14वी सदी में जन्मी एक आदरणीय कुलीन स्त्री को समर्पित है जिन्हें करणी माता के नाम से जाना जाता है. मंदिर में लघबघ 20000 काले और सफ़ेद चूहे है और उन चूहों को माता की संतान मानते है | ये चूहे हर समय मंदिर में ही घूमते रहते है चाहे वो करणी माता मंदिर का प्रवेश द्वार हो या गर्भगृह, हर जगह चूहे आपको प्रसाद खाते या चढ़ावे का दूध पीते हुए नजर आ जायेंगे|

जब 15वी सदी में करणी माता का मंदिर  बनाया गया तो वो आकार में छोटा था एक खुला प्रांगण और उसी प्रांगण के बीच में छोटे मंदिर में करणी माता की मूर्ति थी | अभी जो मंदिर है उसको बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने बनवाया था सन 1940 के आसपास, और वर्तमान मंदिर मुग़ल शैली में निर्मित है| माता के चमत्कारों से जुडी कई मान्यताये 500 साल से प्रचलित है और मुझे भी उनकी असल कहानी पता चली मंदिर में भजन गाने वाले एक सेवक से | जो की मै करणी माता मंदिर के इस लेख में आपके साथ साझा करूंगा लेकिन उस से पहले मंदिर की कुछ तस्वीरे |

karni mata mandir
गुलाबी परकोटो वाला करणी माता का मंदिर
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करणी माता मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ सिंह की प्रतिमाए है.

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करणी माता का इतिहास

करणी माता का जन्म 1387 में मारवाड़ ( जोधपुर ) के सुवाप गाँव में मेहाजी चारण के घर हुआ था, वो मेहाजी की छट्ठी संतान थी| चारण असल में चरवाहे होते थे लेकिन वो कवी और कलाकार भी थे इसलिए राजपूत राजाओ के दरबार में आश्रय लेते थे और उनके लिए विरदावलिया लिखते थे|

जन्म के बाद मेहाजी ने अपनी छट्ठी सन्तान का नाम रिद्धा बाई रखा था, एक दिन रिद्धा बाई ने बचपन में केवल अपने स्पर्श से अपनी बुआ की टूटी हुई टेढ़ी ऊँगली ठीक कर दी थी उसके बाद उनकी बुआ ने उनको करणी  नाम दिया| मेहाजी ने करणी जी का विवाह देपोजी चारण से कर दिया लेकिन करणी ने विवाह के बाद साफ मना कर दिया के उन्हें शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है| बाद में देपोजी से करणी जी ने अपनी छोट्टी बहन का विवाह करवा दिया और खुद तपस्विनी जीवन जीने लगी, यंही से शुरू होती है उनकी करणी से करणी माता बनने की कहानी|

इस घटना के कुछ साल बाद मारवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा, चारणों के पशु बिना चारे के मरने लगे| इस बात को देखते हुए देपोजी और करणी जी ने जांगलू प्रदेश में बसने की योजना बनाई, जांगलू वही जगह है जहा वर्तमान में बीकानेर, गंगानगर है| जांगलू जैसे ही करणी जी और उनका परिवार पहुंचा तो राव कानजी ने उन्हें वहां से जाने का आदेश दिया क्यूंकि वो जगह उनके राज्य में आती थी| कानजी गुस्से में उनका सामान बैलगाड़ी से उतारने आगे बढ़ा लेकिन करणी जी ने जमीन पर एक लकीर खींच दी और कानजी को आगाह किया के अगर वो इस लकीर को पार करेगा तो मारा जाएगा| कानजी ने परवाह ना करते हुए लकीर पार की और वहीँ मारा गया, इस घटना के बाद करणी जी को सब करणी माता मानने लगे और वो जांगलू में ही जीवन यापन करने लगी |

कानजी के बाद राव रणमल को गद्दी पर बैठाया गया, जब राव रणमल मेवाड़ में मारे गये तब उनके पुत्र जोधा को करणी माता  ने आश्रय दिया और एक नयी सेना बनाने में मदद की| बाद में उसी राव जोधा ने जोधपुर की स्थापना की और उनके दिल में माता के लिए बहुत श्रद्धा थी, जोधपुर किले की नींव रखते समय उन्होंने माता को भी बुलाया था| राव जोधा के बेटे राव बीका जब गद्दी न मिलने पर कुछ सैनिको के साथ नया प्रदेश बनाने जब जांगलू आये तब वो भी करणी माता के पास पहुंचे, माता ने उनको आशीर्वाद दिया और आसपास के छोटे छोटे गाँवों पर कब्ज़ा करने की सलाह दी जहाँ के मुखिया जाट थे|

बीका को नए राज्य की जरूरत थी और उन्होंने माता की सलाह पर आसपास छोटे गाँवों को अपने कब्जे में लेकर बीकानेर की नींव रख दी, इन बातो से साबित होता है की क्यूँ करणी माता के प्रति जोधपुर और बीकानेर दरबार में इतनी श्रद्धा थी| ये तो था रिद्धा बाई से करनी माता  बनने की कहानी इन सब से परे भी उन्होंने आमजन की खूब सहायता की कई चमत्कार दिखाए|

करणी माता मंदिर देशनोक की गाथा

KARNI MATA PHOTO
गर्भग्रह , जहाँ करणीमाता की मूर्ति है

करनी माता का मंदिर जिस जगह बना है बताते है वही माता ने प्राण त्यागे थे, जांगलू क्षेत्र के देशनोक में जब करणी माता  रहती थी तो उनके साथ देपोजी, उनकी पत्नी और देपोजी की 4 संतान भी रहती थी| माता के साथ चारो पूजा अर्चना करते थे अत: माता को उनसे बहुत लगाव था, एक दिन देशनोक के पास स्थित कोलायत सागर में डूबकर उनमे से सबसे छोटे लक्ष्मण की म्रत्यु हो गई| माता इस बात से टूट गई और यमराज का आव्हान किया और उनसे लक्ष्मण को न ले जाने की प्रार्थना की, यमराज ने करणी माता के ना मानने पर लक्ष्मण को सफ़ेद मूषक रूप में पुर्नजीवित कर दिया साथ में वरदान दिया के उनके बाकी दत्तक पुत्र भी म्रत्यु पश्चात मूषक ( चूहे ) के रूप में पुनर्जीवन लेंगे|

इसलिए ये मान्यता है की जो भी मूषक मंदिर में है वो सब चारण वंश के लोग है जो म्रत्यु के बाद मूषक बन जाते है, और मंदिर के पुजारी इन्हें काबा कहते है अगर आप चूहा कहेंगे उनके आगे तो शायद पुजारियों का गुस्सा झेलना पड़ जाए | मान्यताओं के अनुसार माता कुल 151 साल जिन्दा रही और जिस जगह प्राण त्यागे वाही आज करणी माता मंदिर  देशनोक है|

करणी माता मंदिर की मेरी यात्रा

मै एक बात करणी माता मंदिर पहुँचने से पहले सुनता आ रहा था की यहाँ मौजूद सफ़ेद चूहे जिसको दिख जाते है वो भाग्यशाली होता है, और वो मात्र 1-2 second के लिए नजर आते है| सुबह यही कोई 7 बजे मंदिर पहुँच गये भीड़ नाम मात्र की थी, प्रवेश द्वार पार करते ही चूहे दिखने लगे जो की जितने बताये जाते है उनसे कम थे क्यूंकि सुबह जल्दी वो अपने बिल में रहते है जो की मंदिर के कोनो में बने है| मंदिर में खूब नजर घुमाई पर सफ़ेद चूहा नहीं दिखा बीकानेर से वापस निकलना था तो फटाफट दर्शन किये और भजन गा रहे सेवको की शरण में चला गया कहानी सुनने|

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एक मारवाड़ी भगत
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प्रसाद चखते मूषक

लोगो में एक डर रहता है की ये मूषक उनपर चढ़ जायेंगे लेकिन मैंने खूब मंदिर में भ्रमण किया और एक भी चूहे ने एसा नहीं किया हाँ गरबगृह में मौजूद चूहे जरुर पैर को स्पर्श कर सकते है क्यूंकि वो जगह छोटी है और भीड़ ज्यादा होती है|

करणी माता मंदिर के उन सेवको से पता चला के अगर किसी इंसान के पैर तले आने से अगर चूहे की मौत हो जाती है तो उसके बदले में सोने या चांदी का चूहा मंदिर में दान करना पड़ता है, इसलिए अगर जाओ तो ध्यान से डर के पैर न रख देना वरना सोने का भाव आपको पता ही है| मंदिर के बाहर चारो तरफ चारण वंश के परिवार रहते है, और वही मंदिर में पूजा करते है वही, चारण जिस वंश की करणी माता थी| एक रोचक बात ये भी मालुम पड़ी के कुछ समय पहले यानी कोई 2-3 दशक पहले जब देशनोक से एक या दो  रेलगाडी गुजरती थी तो वो तब तक देशनोक स्टेशन पर खड़ी रहती थी जब तक मंदिर के ऊपर एक चील आके नहीं बैठती थी|

कैसे पहुंचे करणी माता मंदिर

बीकानेर से देशनोक करणी माता मंदिर  लघभग 40km दूर है, आने जाने की सड़क अच्छी हालत में है जो की जोधपुर को जाती है, मुख्य सड़क से थोडा अंदर मंदिर है |

बस- सरकारी और निजी बस हर 20 मिनट में बीकानेर से देशनोक आती रहती है.

रेल- देशनोक में रेलवे स्टेशन है जहाँ कुछ बीकानेर आने जाने वाली हर गाडी रूकती है , इसलिए सबसे अच्छा विकल्प है रेलमार्ग.

कुछ अन्य जानकारी

पता- देशनोक, बीकानेर ( राजस्थान ) 334801

समय – सुबह 4 बजे से देर रात

अगर आरती में शरीक होना है तो सुबह 4  बजे और शाम को आरती होती है,

करणी माता मंदिर के इस लेख मे कुछ जानकारी अधूरी रह गई हो तो कमेंट करके पूछ सकते है .

मेरा पिछला ब्लॉग देवीकुंड सागर 

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

2 thoughts on “करणी माता मंदिर | A Tale behind Rat Temple

    VJ Sharma

    (August 29, 2018 - 12:30 pm)

    Today is the day to read Hindi blogs and this one is unique description of Karni Mata Mandir. Good job !

      rao ankit

      (August 29, 2018 - 2:28 pm)

      धन्यवाद vj shrma जी 🙂

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