rani laksmi bai

झाँसी की रानी की समाधि ग्वालियर

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तानसेन का मकबरा देखने के बाद मेरी योजना थी जय विलास जाने की, क्यूंकि शाम हो चुकी थी और आगरा निकलना था लेकिन शायद किस्मत में झाँसी की रानी की समाधि पर जाना लिखा था. हुआ यूँ के जो रास्ता मकबरे से जय विलास को जाता है उसी रस्ते पर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का समाधि स्थल बना है और मेरी कार जिस जगह जाम में फंसी वो जगह थी फूल बाग़ जहाँ मुख्य द्वार पर लिखा था rani lakshmi bai memorial .

मैंने पहले भी पढ़ा था उनकी मौत ग्वालियर में ही हुई थी यंही समाधि भी है , लेकिन केवल एक दिन की यात्रा होने के कारण मेरे दिमाग से उनका समाधि स्थल निकल गया था . खैर किस्मत अच्छी थी जो समाधि स्थल जाम के वजह से दिख गया और यंहा कुछ पल बिताने का मौका मिला .

झाँसी की रानी की समाधि पर
झाँसी की रानी का समाधि स्थल

अब कुछ बात करते है झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की .

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का छोटा सा जीवन परिचय

झाँसी की रानी, समाधि

नवम्बर 1828 में उनका जन्म मोरोपंत नाम के एक मराठा के घर हुआ था जो की पेशवा बाजीराव की सेना में काम करते थे , लक्ष्मीबाई को बचपन में मनु कहा जाता था असल नाम उनका मणिकर्णिका था . 14 साल की उम्र में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ और विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मी बाई रखा गया . 1853 में रानी को एक पुत्र हुआ जिसकी 4 महीने में ही म्रत्यु हो गई थी और महाराजा का स्वास्थ्य भी उस समय खराब था तो उन्होंने एक पुत्र गोद लिया ताकि उनका वंश आगे बढ़े . कुछ समय बाद महाराजा का निधन हो गया और झाँसी की कमान लक्ष्मी बाई के हाथ में गई.

भारत में जब लक्ष्मी बाई ने झांसी की गद्दी सम्भाली थी तो अंग्रेजो का एक कानून जोरो पर था राज्य हड़प निति , वो जिस भी राज्य में जाते वहां की रियासतों से जमीन छीन लेते थे. जमीन हड़पने वो झांसी भी आये और रानी के दत्तक पुत्र दामोदर पर अदालत में मुकदमा चलाया हालाँकि वो मुकदमा रानी के पक्ष में रहा लेकिन अंग्रेजो ने महाराजा गंगाधर के कर्ज के बदले झाँसी का खजाना जब्त कर लिया. रानी कुछ समय के लिए किला छोड़कर महल में रहने लगी और वहीँ से अंग्रेजो को खदेड़ने की योजना बनाने लगी .

1857 में मंगल पाण्डेय ने गोरो के खिलाफ आजादी का पहला बिगुल बजा दिया बैरमपुर में धडाधड 4 गोरो को मार दिया और गिरफ्तार हो गये लेकिन उनके इस काम से देशभर में अंग्रेजो के खिलाफ जंग लड़ने लोग एक हो गये . इस क्रान्ति का मुख्य केंद्र झांसी बना जहाँ रानी लक्ष्मी बाई ने सेना तैयार की उसमे महिलाओ को भी भर्ती किया सन 1858 में अंग्रेजो ने झाँसी को घेर लिया ताकि यंहा लगी क्रान्ति की आग को वो दबा दे. झाँसी की के गद्दार सेनापति के कारण वीरता से लड़ रही लक्ष्मी बाई को अपने पुत्र दामोदर के साथ भागना पड़ा क्यूंकि सेनापति ने किले का द्वार खोल दिया जिस से अंग्रेजो की विशाल सेना किले में प्रवेश कर गई और झाँसी की हार निश्चित हो गई .

वह से भागने के बाद झाँसी की रानी तांत्या टोपे से मिली और उनकी सेना और ग्वालियर के विद्रोही सैनिको के साथ ग्वालियर के किले पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने कब्जे में लिया. सिंघिया परिवार जो की इस किले पर राज करता था वो अंग्रेजो के साथ था इस लिए रानी ने इसे ही निशाना बनाया ताकि अंग्रेजो की ताकत को कम किया जा सके. किला जीतने के बाद उनकी अंग्रेजो से कई दिन तक लड़ाई चलती रही और अंत में 18 जून 1858 को कोटा की सराय नाम की जगह पर फिरंगी गोली लगने से उनकी मौत हो गई और आजादी की पहली लड़ाई कुछ दिन बाद शांत हो गई.

ये उनका छोटा सा परिचय था उनकी वीर गाथा की झलक भर था अब आगे समाधि स्थल की कुछ तस्वीरे .

झाँसी की रानी की समाधि स्थल पर मेरी यात्रा

phool baag

जब इस स्थल पर प्रवेश किया तो सबसे पहले कुछ पंक्तियो पर नजर पड़ी जो की ये थी

इस समाधि में राखी हुई है, एक राख की ढेरी |

जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी |

यह समाधि यह लघु समाधि है , झाँसी की रानी की |

अंतिम लीलास्थली यही है , लक्ष्मी मर्दानी की ||

सुभद्रा कुमारी चौहान जी की लिखी हुई ये पंक्तिया है जो की उनकी रचना झांसी की रानी से ली गई है पूरी कविता पढने के लिए यंहा जाए – झाँसी की रानी

यही इस शिला के पास से रस्ता जाता है जहाँ सामने एक घोड़े पर बैठी रानी का पुतला है और उसके सामने समाधि, इन दोनों के बीच जलती हुई शहीद ज्योति जो की हमेशा जलती रहती है. यंहा बाग़ में आराम फरमा रहे एक शक्श से मेरी मुलाकात हुई जो की पेशे से अध्यापक है और उनसे कुछ देर मैंने रानी की जीवन की जानकारी ली.

शहीद ज्योति

अंत में यही कहूँगा अगर ग्वालियर जाते है तो झाँसी की रानी की समाधि पर जरुर जाएँ आज हम इन वीरो के कारण ही आजाद देश में बैठे है नहीं तो आज भी हम हमारी ही जमीन पर गोरो के गुलाम होते.

मेरा पिछला ब्लॉग – तानसेन का मकबरा

ग्वालियर का अन्य ब्लॉग – गुजरी महल की यात्रा

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

1 thought on “झाँसी की रानी की समाधि ग्वालियर

    […] से की थी उसके बाद ग्वालीयर दुर्ग, रानी लक्ष्मी बाई की समाधि और तानसेन मकबरा देखा . जय […]

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