photographers in jhalawar

त्याग का गवाह गागरोन किला – gagron fort jhalawar

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राजस्थान के सैंकड़ो साल के इतिहास में कई ऐसे राज दर्ज है जिन्हें आज भी समझने की कोशिश की जाती है वजह केवल एक है की वो इतिहास हैरान करता है कई ऐसे सवाल खड़े करता है जिनके जवाब कोई नहीं दे पाया है .बूंदी के दुर्ग में घूम कर आने के बाद gagron fort jhalawar के बारे में सुना जिसके इतिहास में वीरता है, बलिदान है, जौहर है . जहा एक पराजित राजा के पलंग को 500 साल तक कोई नहीं हिला पाया और एक तोते ने कर दिया था गद्दार को शर्मसार ऐसी कई कहानिया है .
आज मै इस लेख में आपको लेकर चलूँगा तीन परकोटे वाला, जल से घिरे हुए और बिना नीव के बने भारत के एकमात्र दुर्ग में जिसका नाम है गागरोन का किला जो की राजस्थान के झालावाड में है .

gagron fort jhalawar और उसका इतिहास

gagron fort jhalawar
गागरोन किले के बाहर से नजारा , नदी में नहाते पशु

दक्षिण राजस्थान और मालवा के बीच काली सिंध और आहू नदी के संगम पर पानी में गिरे इस गागरोन दुर्ग का निर्माण डोड राजा बीजलदेव ने करवाया था बाद में इस किले पर खिंची राजपूतो ने राज किया. कभी इस किले 92 मंदिर होते थे और सौ साल का पंचांग भी यही बना था. सीधी खड़ी चट्टानों पर ये किला आज भी बिना नींव के सधा हुआ खड़ा है, किले में तीन परकोटे है जबकि राजस्थान के अन्य किलो में दो ही परकोटे होते है. झालावाड किले में दो प्रवेश द्वार है एक पहाड़ी की तरफ खुलता है तो दूसरा नदी की तरफ , किले के सामने बनी गिद्ध खाई से किले पर सुरक्षा हेतु नजर राखी जाती थी .

Gagron fort jhalawar दो तरफ से नदी एक तरफ से खाई और एक तरफ से पहाड़ी से घिरा हुआ है . तेरहवी शताब्दी में अल्लाउदीन खिलजी ने किले पर चड़ाई की जिसों राजा जैतसिंह खिंची ने विफल कर दिया था . 1338 ई से 1368 तक राजा प्रताप राव ने गागरोन पर राज किया और इसे एक समर्ध रियासत बना दिया बाद में सन्यासी बनकर वही राजा संत पीपा कहलाए, गुजरात के द्वारका में आज उनके नाम का मठ है .

लघभग चौदहवी सदी के मध्य तक गागरोन किला एक समर्ध रियासत बन चूका था इसी वजह से मालवा के मुस्लिम घुसपैठिये शासको की नजर इस पर पड़ी . होशंग शाह ने 1423 ईस्वी में तीस हजार की सेना और कई अन्य अमीर राजाओ को साथ मिलाकर गढ़ को घेर लिया .

krishan pol gagron jhalawar fort, झालावाड का किला
कृषण पोल गागरोन किले के शस्त्रागार का प्रवेश द्वार

गढ़ पानी से घिरा होने के कारण होशंगशाह किले में प्रवेश नहीं कर पाया और गढ़ के बाहर डेरा जमा लिया . संकट के समय पूरा नगर गागरोन किले  में ही शरण लेता था यंहा पानी और अनाज के उचित भण्डार थे इसी वजह से होसंग्शाह के आक्रमण के बावजूद कई महीनो तक नगरवासी दुर्ग में सुरक्षित रहे . अंत में होशंगशाह को पता चला की नदी से एक मार्ग की सहायता से पानी किले में जाता है किले में ही अनाज की व्यवस्था है अत: उसने नदी में गाय का मांस डलवा दिया दूषित पानी और अनाज पानी की कमी के चलते मजबूरन होशंगशाह से सैन्य शक्ति में कमजोर अचलदास को युद्ध के लिए किले से बाहर आना पड़ा .

हार निश्चित थी इस लिए कायरता के साथ मरने से बेहतर राजा अचल दास ने सेना सहित साका करने की ठानी और होशंगशाह पर आक्रमण कर दिया .

गागरोन किले का जौहर

jauhar kund gagron kila
गागरों का जौहर कुंड जंहा हजारो महिलाओ ने जान दी थी

झालावाड के इस गागरोन किले में जौहर की भी सच्ची कहानिया मौजूद है किले में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले जौहर कुंड आता है साधारण से दिखने वाले इस कुंड में हजारो महिलाओं ने राजपूती मर्यादा के लिए जौहर किया था . किले में जौहर राजा अचलदास खिची के पराजित होने के बाद हुआ था .

झालावाड घुमने की जगह
किले की वो दीवारे जहा से राजा अचलदास ने अपनी रानियों से आखरी मुलाक़ात की थी

ये किला जो आज खंडहर दिखता है जिसका ये गलियारा सुनसान दिखता है उसने दो रानियों और एक राजा के बीच आखरी वार्तालाप को सुना है , उनके करीब आती मौत को महसूस किया है . राजा अचलदास खिंची का विवाह मेवाड़ की राजकुमारी लाला कँवर और बीकानेर की राजकुमारी कौमुदी से हुआ था , होशंगशाह के साथ युद्ध के समय साका करने से पहले अचल दास ने दोनों रानियों के साथ उपर चित्र में दिखाई गई जगह पर ही आखरी बार वार्तलाप किया था . होशंगशाह ने अचलदास को रण में छल कपट से पराजित कर दिया और बंधी बना लिया किले में खबर लगते ही रानियों ने नगर की अन्य औरतो के साथ मर्यादा की रक्षा हेतु जौहर कर लिया और गागरोन किला एक वीरान किला बनकर रह गया . होसंगशाह के बाद अकबर , बहादुरशाह और कई अन्य मुस्लिम शाशको ने किले में युद्ध किये और राज किया .

हीरामन तोत्ता और उसके द्वारा दरबारी को शर्मसार करना

heeraman tota gaagron
गागरों दुर्ग में आज यही हीरामन तोत्ते पाए जाते है

लघबग 1532 में गुजरात के बहादुर शाह ने किले पर आक्रमण कर इसे मेवाड़ के महाराणा विक्रमादित्य से जीत लिया था और किले पर कई साल तक राज किया , बहादुर शाह किले में पाए जाने वाले हीरामन तोत्ते को अपने साथ रखता था हीरामन तोत्ते बोलने में माहिर थे और वफादार भी . उस दौर मे मुग़ल एक खतरनाक रियासत के रूप में उभर रहे थे , हुमायूं ने बहादुरशाह को पराजित करके किले को जीत लिया और उस तोत्ते को भी कैद कर लिया .

हुमायूं ने बहादुरशाह के सेनापति को युद्ध से पहले अपने साथ शामिल कर लिया था यानी के छल से बहादुर शाह को हराने के लिए . जब सेनापति युद्ध पश्चात हुमायु से मिलने आया तो हीरामन उसे देखते ही गद्दार गद्दार चिल्लाने लगा और रूमी खान शर्मसार अपनी गलती के लिए पछतावे के साथ हुमायु के सामने खड़ा रहा . हुमायूं ने क्रोध में आकर कहा अगर ये तोत्ता इंसान होता तो इसी जगह सर कलम कर देता खैर सर कलम करने का फायदा कुछ नहीं था रूमी खान को उसकी गलती का एहसास होचुका था .

हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक भी गागरोन का किला

किला हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक भी है यंहा हर साल सूफी संत मीठे शाह की दरगाह मे मुह्र्रम के महीने में बड़ा आयोजन भी होता है , किले के बहार हनुमान मंदिर और मजार भी आमने सामने पास पास बने हुई है इसके अलावा किले में संत पीपा का मठ भी है

आज़ादी के बाद गागरोन किला

आजादी के पहले तक यंहा कई राजाओ ने राज किया उनके अस्त्र शस्त्र , अचल दास खिंची का मशहूर पलंग , तोप इत्यादि किले में मौजूद थी लेकिन आजादी के बाद कोटा रियासत खत्म हो गई और किले के सभी सामान को लोगो ने गायब कर दिया . राजा अचलदास की भारी भरकम तलवारों में से एक को उच्च अधिकारी ले गये और दूसरी को चोर चुरा कर ले जाते वजन अधिक होने कारण छोड़ गये जो अब झालावाड थाणे में रखी है . महल के पलंग और तोप स्थानीय लोग चुरा ले गये महल में बचा है तो केवल इतहास बोलती दीवारे और कुछ राजपूती मुग़ल कलाए .

कैसे पहुंचे

किला झालावाड से 10 किलोमीटर दूर जंगल में स्तिथ है अत यंहा तक आने का साधन केवल टैक्सी या ऑटो है या आपका निजी साधन . झालावाड कोटा के साथ रेलमार्ग से जुडा हुआ है और राजकीय बस निरंतर चलती रहती है झालावाड से कोटा लघबग 110 km. और बारां 80 km. दूर है आने जाने के लिए स्टेट हाईवे अच्छी हालत में है

टिकेट

भारतीय व्यस्क – 50 रुपए
विदेशी व्यस्क -200
भारतीय विद्यार्थी -5 रुपए
विदेशी विध्यार्ती – 20 रुपए

किले में देखने लायक जगह
achal daas khinchi bed
जनाना महल , यही अचलदास का पलंग पांच सौ साल तक रहा था

gagron में देखने लायक गणेश पोल , नक्कार खाना , जनाना महल,दीवाने आम , दीवान ऐ ख़ास , भैवी पोल, किशन पोल , रंग महल इत्यादि कुछ जगह है  .
गागरोन किला देखने जाए तो गाइड की व्यवस्था जरुर कर ले क्युकी इतिहास ही है जो इस किले को खूबसूरती के बाद मशहूर बनाता है .

अगले लेख में अचलदास और उनके पलंग से जुड़े किस्से को पढ़े ..

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

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