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मोईनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर अजमेर दरगाह की यात्रा

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अभी हाल में ही मै अजमेर दरगाह शरीफ से मोईनुद्दीन चिश्ती का उर्स महोत्सव देख कर लौटा हूँ, और इस यात्रा के बाद मन में चिश्ती साहब के प्रति आस्था और भी बढ़ गयी है| भारत में अजमेर का उर्स सबसे मशहूर है क्यूंकि इस उत्सव में हर साल लघभघ 4 लाख लोग अजमेर दरगाह में आते है| अजमेर दरगाह ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का मकबरा है और चिश्ती साहब न केवल मुस्लिम धर्म में बल्कि हिन्दू धर्म में भी खूब लोकप्रिय है | उनको गरीब नवाज अर्थात गरीबो के मसीहा नाम से भी जाना जाता है|

मै उर्स 2019 के मौके पर अजमेर में था और इस यात्रा चिट्ठे में मै अपना अनुभव आपसे साझा करूंगा|

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मजार पर चढ़ावे के लिए खुसबूदार गुलाब बेचता एक युवक

क्या होता है उर्स उत्सव

दक्षिण एशिया के देशो में जब किसी सूफी संत की पुण्यतिथि होती है तब उनकी दरगाह में एक उत्सव मनाया जाता है जो की 6 दिन तक चलता है और इसी उत्सव को उर्स कहा जाता है| दरअसल दक्षिण एशियाई देशो में सूफी संतो को चिश्ती कहा जाता है चिश्ती यानी के अल्लाह के प्रेमी | उर्स के दौरान 6 दिन तक स्थनीय गायकों द्वारा  24 घंटे कव्वाली गाई जाती है |

कौन थे मोईनुद्दीन चिश्ती

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निजामी गेट

इतिहासकारों के अनुसार मोईनुद्दीन चिश्ती ईसा पूर्व 1141 में इरान के चिश्ती शहर में पैदा हुए थे| 15 साल की उम्र के चिश्ती साहब के माता पिता का देहांत हो गया और इस घटना के बाद मोईनुद्दीन चिश्ती को विरासत में जो भी धन या संपत्ति मिली उनको वो गरीबो में बाँट वे बुखारा शहर प्रस्थान कर गये| बुखारा में सूफी संतो के साथ रहकर उन्होंने मुस्लिम धर्म की शिक्षा ली और बुखारा से मदीना तक की यात्रा कर लोगो में ज्ञान बांटा|

सूफी जीवन अपनाने के बाद से चिश्ती साहब का सपना था के वे मुहम्मद से आशीर्वाद प्राप्त करे और अपने इसी सपने के लिए वे लाहौर में काफी समय तक मुइज्ज अल दीन मुहम्मद के साथ रहे और बाद में अजमेर आकर बस गये| अजमेर  में जिस जगह बैठकर चिश्ती साहब मुस्लिम और गैर मुस्लिम लोगो में अमन और शान्ति का पाठ पढ़ते थे आज उसी जगह उनकी मजार है और वही जगह बाद में दरगाह बनाई गई जिसका निर्माण मुग़ल काल में हुआ|

उर्स उत्सव पर मेरी अजमेर यात्रा

मै जब मनाली से वापस आ रहा था तो मेरे एक काफी पुराने दोस्त से मेरी बात हुई जो की अजमेर अक्सर जियारत करने जाता रहता है, बात चीत के दौरान ही उसने मुझे अजमेर आने के लिए बोल दिया| हालाँकि वाकई में मेरा मन अजमेर दरगाह जाने का था लेकिन कभी सही समय नहीं मिल पाया, खैर दोस्त ने मुझे बता दिया था के अभी अजमेर में उर्स उत्सव चल रहा है इस दौरान वहाँ देश भर से श्रद्धालु मन्नत मांगने आते है| मैंने इस समय को अजमेर घूमने का सही समय पाया और दिल्ली में मनाली की बस से उतरते ही अजमेर की बस पकड़ ली|

एक लम्बे सफ़र के बाद मै अगली सुबह पहुँच गया अजमेर, अगरबत्तियो और गुलाब की खुशबु से महकती दरगाह जाने वाली सड़क पर हलकी आवाज में सुनाई देती क़व्वाली मानो हमे दरगाह में आमंत्रित कर रही थी| दरगाह पहुँच कर मै वहां कव्वाली सुनने लगा और मेरा दोस्त चला गया नमाज अदा करने| दरगाह के अंदर कैमरा ले जाना मना है मगर आप मोबाइल से तस्वीरे ले सकते है मैंने भी दरगाह की कुछ तस्वीरे ली|

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अजमेर दरगाह शरीफ का प्रमुख द्वार

 

करीब एक घंटे तक मैंने कव्वाली सुनी और कोशिश की उन शब्दों को समझने की तब तक मेरा दोस्त भी आ चूका था और हम दरगाह में कुछ खरीददारी करने चल पड़े| असल में ये जो कव्वाली होती है ये एक सूफी संगीत होता है जो मन और दिमाग को शांत कर देता है जिस समय हम कव्वाली सुनते है दिमाग से सब तरह की समस्याए निकल जाती है और हम सकारात्मक सोचने लगते है, ऐसा मेरा मानना है बाकी सबकी अलग अलग पसंद होती है 🙂 🙂

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दरगाह के अंदर

एक बात जो मुझे दरगाह घूमते हुए दोस्त से पता चली के दरगाह पर चढ़ावे के लिए फूल खरीदते वक्त उन्हें सुंगने की गलती न करे ऐसा करना बिलकुल दरगाह के नियमो के खिलाफ है, अत: अगर आप ये लेख पढने के बाद दरगाह जाते है तो ऐसी गलती करने से बचे| दरगाह में रोज 2400 किलो खिचड़ी ( मीठे चावल ) श्रधालुओ को खिलाये जाते है जो की माना जाता है नमाज के बाद चखना जरूरी होता है | नीचे अजमेर दरगाह की एक विडियो भी साझा कर रहा हूँ|

 

 

दरगाह के बाद हम पास में मौजूद एक और एतिहासिक इमारत देखने चले हए जिसे अढाई दिन का झोंपड़ा कहा जाता है, हालांकि इस मस्जिद के पीछे का इतिहास सही से किसी को मालुम नहीं कहा जाता है की ये एक संस्कृत महाविद्यालय था जिसे मुस्लिम आक्रान्ताओं ने अजमेर जीतने के बाद मस्जिद में तब्दील कर दिया|

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अढाई दिन का झोंपड़ा

अगर आप अजमेर में है तो कुछ समय निकाल अढाई दिन का झोंपड़ा देखने जा सकते है, दरगाह से एक पतला सा रास्ता इस जगह तक जाता है जिसके दोनों किनारों पर हर तरह का खाना और खरीदने की चीजे मिलती है |

कैसे पहुंचे अजमेर दरगाह शरीफ

अजमेर सड़क और रेल मार्ग से भारत के कई बड़े शहरो से जुड़ा हुआ है जहाँ से निरंतर समय पर बस और रेल सेवा उपलब्ध है| अजमेर का निकटतम हवाई अड्डा जयपुर में है जहाँ से दिल्ली मुंबई और बंगलोरे के लिए फ्लाइट उपलब्ध है| अजमेर पहुँच कर आप नीचे दिए गये मैप को फॉलो कर दरगाह शरीफ पहुँच सकते है|

अजमेर दरगाह में उर्स उत्सव की तारिख – 8 मार्च से 17 मार्च

मेरा पिछला ब्लॉग – कुफरी में बर्फबारी 

Post Author: rao ankit

few months ago in 2017 I decided I'd rather make no money and do what I love rather than make alot of money and hate my job. now i think choosing traveling is Best decision of my life

3 thoughts on “मोईनुद्दीन चिश्ती के उर्स पर अजमेर दरगाह की यात्रा

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